Friday, June 1, 2012

किनारे का सच

बरबादियों की ओर बढ़ा जा रहा हूँ
आज फिर तुमसे मोहब्बत किये जा रहा हूँ
किनारा मिलेगा कैसे मुझे जब
खुद ही समंदर की ओर बहे जा रहा हूँ

आज फिर तुमसे मोहब्बत किये जा रहा हूँ |

भूला नहीं है वो एहसास मुझको
मिल न रही थी जब एक साँस मुझको
वो तूफान वो पानी किनारा न दिखना
जहाँ छोड़ कर चले आये थे मुझको

 फिर भी मैं ये क्या किये जा रहा हूँ
आज फिर तुमसे मोहब्बत किये जा रहा हूँ |

 दिन कैसे बीते, कैसे रातें बिताईं
खुद की ही बातें खुदी को सुनाई
डूबता-उभरता हवाओं सहारे
जब आज मैं लग गया हूँ किनारे

 तो क्यों फिर वो गलती मैं दोहरा रहा हूँ
आज फिर तुमसे मोहब्बत किये जा रहा हूँ |






Sunday, May 27, 2012

आज बारिश का इंतज़ार नहीं

आज बारिश का इंतज़ार नहीं
तुम जो यहाँ नहीं ।

बूंदों से लगाव नहीं
हवाओं से प्यार नहीं
आज कोई बहार नहीं
तुम जो यहाँ  नहीं

कोई नई कहानी नहीं
कोई याद पुरानी नहीं
आज कोई बात नहीं
आज कोई जज़्बात नहीं

आज कोई आह नहीं
आज कोई राह नहीं
आज कोई गीत नहीं
आज कोई वाह नहीं

आज बारिश का इंतज़ार नहीं
तुम जो यहाँ नहीं ।

आज कोई कसम नहीं
आज कोई रसम नहीं
आज कोई दर्द नहीं
आज कोई इलाज़ नहीं

आज कोई आस नहीं
आज कोई प्यास नहीं
आज कोई दूर नहीं
आज कोई पास नहीं

अब कोई सपना नहीं 
अब कोई अपना नहीं 
अब कोई यार नहीं 
अब किसी से प्यार नहीं 

आज बारिश का इंतज़ार नहीं
तुम जो यहाँ नहीं ।

Monday, March 26, 2012

ये दुनियां

दिखावा ! दिखावा! दिखावे की दुनियां
न तेरी न मेरी, किसी  की ये दुनियां

न यादों की दुनियां न वादों की दुनिया
टूटे हुए स्वप्न साज़ों की दुनिया

अंधेरों की दुनियां ये  रातों की दुनिया
चरमर से करते इरादों की दुनियां

आरों की दुनिया न प्यारों की दुनिया
बेबस परेशान बेसहारों की दुनिया...

Saturday, November 12, 2011

रात यूँ कहने लगा मुझसे गगन का चाँद


रात यूँ कहने लगा मुझसे गगन का चाँद ,
आदमीं भी क्या अनोखा जीव होता है !
उलझाने अपनी बना कर आप ही फंसता ,
और फिर बेचैन हो जगता, सोता है |

जानता है तू की मैं कितना पुराना हूँ ?
मैं चूका हूँ देख मनु को जनमते मरते
और लाखों बार तुझसे पागलो को भी ,
चांदनी में बैठे स्वप्नों पर सही करते |

आदमी का स्वप्न है वह बुलबुला जल का,
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ,
किन्तु फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो,
बुलबुलों से खेलता ,कविता बनाता है |

मैं बोला किन्तु मेरी रागनी बोली ,
देख फिर से चाँद ! मुझको जनता है तू ?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं ? है यही पानी ?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू ?

मैं वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनता हूँ ,
और उसपर नीव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठता हूँ |

मनु नहीं, मनु पुत्र है यह, सामने जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल ,
स्वपन के भी हाँथ में तलवार होती है |

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,
रोज़ ही आकाश चदते जा रहे हैं वे ,
रोकिये जैसे बने की स्वप्न वालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ाते आरहे हैं वे |
                                       
                                              -श्री रामधारी सिंह 'दिनकर '