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Friday, June 1, 2012

किनारे का सच

बरबादियों की ओर बढ़ा जा रहा हूँ
आज फिर तुमसे मोहब्बत किये जा रहा हूँ
किनारा मिलेगा कैसे मुझे जब
खुद ही समंदर की ओर बहे जा रहा हूँ

आज फिर तुमसे मोहब्बत किये जा रहा हूँ |

भूला नहीं है वो एहसास मुझको
मिल न रही थी जब एक साँस मुझको
वो तूफान वो पानी किनारा न दिखना
जहाँ छोड़ कर चले आये थे मुझको

 फिर भी मैं ये क्या किये जा रहा हूँ
आज फिर तुमसे मोहब्बत किये जा रहा हूँ |

 दिन कैसे बीते, कैसे रातें बिताईं
खुद की ही बातें खुदी को सुनाई
डूबता-उभरता हवाओं सहारे
जब आज मैं लग गया हूँ किनारे

 तो क्यों फिर वो गलती मैं दोहरा रहा हूँ
आज फिर तुमसे मोहब्बत किये जा रहा हूँ |






Thursday, January 13, 2011

चलो कोई तो बुरी आदत डालें

चलो कोई तो बुरी आदत डालें,
ज़िन्दगी इतनी साफ़ सुथरा अच्छी नहीं लगती

छुपाने को जो कुछ न हो, तो बताने में मज़ा ही क्या
आओ कोई तो राज़ पालें, ज़िन्दगी बिना राजों के अच्छी नहीं लगती

मिलादे सुरों में एक सुर अपना,कूद जाएँ समंदर में
ज़िन्दगी बैठकर किनारे अच्छी नहीं लगती..

बटोरें चाँद टुकड़े और बुने फिर ख्वाब एक अपना
ज़िन्दगी बिना क्वाबों के भी अच्छी नहीं लगती..

चलो कोई तो बुरी आदत डालें,
ज़िन्दगी इतनी साफ़ सुथरा अच्छी नहीं लगती..